सूत्रों के मुताबिक, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL ) भारत में बनाए जाने वाले सुखोई सुपरजेट 100 (SJ-100) विमानों के लिए मूल फ्रांसीसी-रूसी पावरजेट SaM146 इंजन पर दांव लगा सकती है।
यह फैसला इसलिए बहुत अहम है क्योंकि रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद अपने विमानों को पूरी तरह 'रूसी' (Russified) बना रहा है और उनमें अपना नया PD-8 इंजन लगा रहा है। लेकिन HAL का यह कदम भारतीय एयरलाइंस को ध्यान में रखकर उठाया जा रहा है, जो किसी नए और अप्रमाणित इंजन टेक्नोलॉजी पर भरोसा करने से कतरा रही हैं।
क्या है यह बड़ा समझौता?
यह खबर 27 अक्टूबर 2025 को मॉस्को में HAL और रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन (UAC) के बीच हुए एक ऐतिहासिक MoU के बाद आई है।इस समझौते के तहत, HAL को घरेलू बाजार के लिए 75 से 100 सीटों वाले SJ-100 को असेंबल करने और बनाने का एक्सक्लूसिव अधिकार मिला है।
1980 के दशक में एवरो HS-748 के बाद यह पहली बार है जब भारत में बड़े पैमाने पर किसी सिविल जेट का उत्पादन होगा।
'उड़ान' स्कीम को मिलेगी नई रफ़्तार
इस विमान को सरकार की 'उड़ान' (UDAN) रीजनल कनेक्टिविटी स्कीम के लिए एक संजीवनी माना जा रहा है।भारत में ही असेंबली होने से यह कम घनत्व वाले रूटों पर ऑपरेशनल कॉस्ट (संचालन लागत) को 20 से 30 प्रतिशत तक कम कर सकता है, जो Embraer E-Jets या ATR-72 को कड़ी टक्कर देगा।
एक अनुमान है कि भारत के Tier-2 और Tier-3 शहरों के लिए ऐसे 200 विमानों की और हिंद महासागर के तटीय देशों के लिए 350 विमानों की जरूरत होगी।
असली पेच: एसएएम146 बनाम पीडी-8 इंजन
इस पूरी डील का केंद्रबिंदु इंजन का चुनाव है।- पुराना और भरोसेमंद (SaM146): मूल SJ-100 विमान में पावरजेट SaM146 Turbofan इंजन लगा था। यह फ्रांस की सैफरन (पहले स्नेकमा) और रूस की NPO सैटर्न का 50-50 जॉइंट वेंचर था। यह इंजन 17,000 से 18,000 lbf का थ्रस्ट देता है और दुनिया भर के मौसम में 15 लाख से ज्यादा उड़ान घंटों का विश्वसनीय रिकॉर्ड रखता है।
- नया और 'रूसी' (PD-8): 2022 के बाद लगे पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते रूस ने 'इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन' (आयात की जगह घरेलू सामान) पर जोर दिया। उसने SaM146 को हटाकर घर में बने PD-8 इंजन का इस्तेमाल शुरू कर दिया, ताकि सप्लाई चेन की दिक्कत न हो।
भारत क्यों चाहता है पुराना इंजन?
दुनिया भर में अब यही 'रूसी' PD-8 इंजन वाला SJ-100 बेचा जा रहा है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि भारत के लिए बनने वाला खास वर्जन SaM146 इंजन के साथ ही आएगा।वजह साफ है: इसे "स्थानीय एयरलाइंस के लिए ज्यादा आकर्षक" बनाना है।
चूंकि SaM146 में फ्रांसीसी टेक्नोलॉजी है, इसलिए भारतीय एयरलाइंस को इसके स्पेयर्स (पुर्जे), मेंटेनेंस इकोसिस्टम और ग्लोबल इंटरऑपरेबिलिटी (वैश्विक स्तर पर काम करने की क्षमता) में कोई दिक्कत नहीं आएगी। यह इंडिगो और एयर इंडिया जैसी कंपनियों के लिए बहुत जरूरी है, जिनके बेड़े में 90% पश्चिमी विमान हैं।
यह कदम भारत को PD-8 इंजन के शुरुआती जोखिमों (टीथिंग रिस्क्स) से भी बचाएगा, जिसका सर्टिफिकेशन अभी चल ही रहा है।
'आत्मनिर्भर भारत' का बड़ा कदम
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस MoU को सिविल एविएशन में "आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम" बताया है। यह 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत हो रहा है, जिसमें 50 से 70% कंपोनेंट्स टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, महिंद्रा एयरोस्पेस या L&T जैसे घरेलू सप्लायर्स से लिए जाएंगे।शुरुआती उत्पादन HAL के नासिक या कानपुर प्लांट में हो सकता है। प्रोटोटाइप का फ्लाइट टेस्ट 2028 तक और डिलीवरी 2030 से शुरू होने की उम्मीद है।
हालांकि, कुछ आलोचक भारत-रूस के पिछले अधूरे प्रोजेक्ट्स, जैसे 5th-Gen फाइटर एयरक्राफ्ट (FGFA) या NAL के हंसा ट्रेनर, की याद दिलाते हैं, जहां टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और प्रतिबंधों के कारण बात आगे नहीं बढ़ पाई थी।
क्या सेना भी करेगी इस्तेमाल?
इस विमान के दोहरे इस्तेमाल की भी चर्चा है। सूत्रों का कहना है कि भारतीय वायु सेना (IAF) इस विमान के मिलिट्री वर्जन में रुचि रखती है। इसे इंटेलिजेंस, सर्विलांस, रिकॉनिसेंस (ISR) या समुद्री गश्ती (मैरीटाइम पेट्रोल) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।इसका चौड़ा फ्यूसलेज (विमान का ढांचा) रोटोडोम रडार या AWACS अपग्रेड के लिए बेहतरीन है। साथ ही, यह -40°C की ठंड झेल सकता है, जो इसे लद्दाख जैसी जगहों के लिए उपयुक्त बनाता है।